नई दिल्ली। अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि अदालतों को यह तय करने से बचना चाहिए कि 'आवश्यक धार्मिक प्रथा' क्या है? बोर्ड ने कहा कि इस तरह की न्यायिक जांच संविधान के अनुच्छेद-25 और 26 के तहत दी गई 'धर्म की स्वतंत्रता' में हस्तक्षेप के समान हो सकती है।
सबरीमला रेफरेंस मामले में दाखिल लिखित दलील में बोर्ड ने तर्क दिया कि किसी धर्म के 'मूल' (कोर) की पहचान स्वभाव से व्यक्तिपरक होती है और यह अनुयायियों की आस्था पर निर्भर करती है। बोर्ड ने तर्क दिया कि किसी धर्म की आवश्यकताओं का निर्धारण आस्था, सिद्धांत और व्याख्या से जुड़े जटिल प्रश्नों से संबंधित है, जिन्हें अदालतों के बजाय धार्मिक विद्वानों और संप्रदायों पर छोड़ना ज्यादा ठीक है।
धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ कथित भेदभाव से सबंधित याचिकाओं के समूह पर 9 जजों की बेंच 7 अप्रैल से अंतिम सुनवाई करेगी। इसमें केरल के सबरीमला मंदिर में हर उम्र की महिलाओं के प्रवेश समेत अन्य मामले शामिल है। इसके लिए चीफ जस्टिस पीठ का गठन करेंगे। 22 अप्रैल तक सुनवाई पूरी हो सकती है। कोर्ट ने सभी पक्षकारों से लिखित दलील मागी थी।
पांच जजों की बेंच ने 2019 1 में धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ कथित भेदभाव का मामला बड़ी पीठ को रेफर किया था। 7 अप्रैल से अंतिम सुनवाई।
इसमें सबरीमला मंदिर में हर उम्र की महिलाओं के प्रवेश, मुस्लिम महिलाओं की मस्जिद मैं एंट्री, पारसी महिलाओं से जुड़े अधिकार के मुद्दे शामिल हैं।
साभार नवभारत टाइम्स
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'अदालतें न तय करें क्या है आवश्यक धार्मिक प्रथा', AIMPLB ने शीर्ष अदालत से कहा
- 30 Mar 2026



