"तव कथामृतम्"
1.नित्य कर्म
उसमें मैं ये नहीं कहूं कि इतने बजे जागो... इतने बजे पूजा करो... इतने बजे स्नान करो... मैं आपको बांधूँगा नहीं... क्योंकि मुझे पता है कि प्रत्येक की बॉडी... प्रत्येक की रुचि भिन्न है... रोज़ यदि एक अभ्यास हो जाए तो अपने समय पर जाग जाना... अपनी अवस्था के अनुकूल जाग जाना... दूसरा नित्य कर्म दंत मंजन करो... शौचादि कर्म...स्नानादि कर्म...संध्यादि कर्म... पूजा पाठ....ये कुछ ना करो तो.... तैयार हो जाओ ऑफिस जाने के लिए... और अपने घर में ठाकुर जी विराजते हो...अथवा तो अपने घट में विराजते हो.... तो वहां 5 मिनट प्रणाम करके... नित्य कर्म रोज़....अगर आप स्वाध्यायी हैं तो रामायण.. गीता... भागवत...कोई भी आपका सदग्रंथ हो... मुझे क्या आपत्ति है....उसका स्वाध्याय रोज़ जो करते हो...
मैं कोई आपको बता नहीं रहा कि ये करो...ये करो... आप जो करो...वो नित्य कर्म हमेशा करना चाहिए... ये विष्णु भगवान की नित्य कर्मी स्वाभाविक लीला है...
2. निमित्त कर्म
जैसे ही हमारे घर कोई महापुरुष आते हैं तो हम कहते हैं चलो हनुमान चालीसा का पाठ रखो...ये निमित्त कर्म है... करने वाले नहीं थे... कोई आए... निमित्त बन गया... और आपने सुंदरकांड का पाठ किया... कोई महापुरुष आया और निमित्त बन गया...हमने उत्सव मना लिया... जन्माष्टमी निमित्त बन गया... हम रात भर जागे... नंद घेर आनंद भयो... नंदोत्सव किया... शिवरात्रि आई... रामनवमी आई... गणेश चतुर्थी के दिन आए तो चलो हम अथर्वशीर्ष का पाठ कर ले... कोई न कोई निमित्त बन गया है....
3.... काम्य कर्म
जो हमारी अपेक्षा है कि हम ये करें और हम इतना पायें...ये करें तो हमें ये लाभ मिले... छूट है...प्रतिबंध नहीं है... हम अपनी मनोकामना पूर्ण करने के लिए जो कर्म करें उसको शास्त्र वैष्णवी काम्य कर्म कहते हैं... कोई मजदूरी करे... कोई खेती करे... कोई व्यापार करे... कोई बिल्डिंग का करे... कोई जमीन का करे...ये सब काम्य कर्म है... ईमानदारी से करना चाहिए....
हम ये अनुष्ठान करेंगे तो हमारा ये काम हो जाएगा... ये भी काम्य कर्म में आता है... हम ये अनुष्ठान करेंगे तो चुनाव जीत जाएंगे... या सरकारी दफ्तर से हमारी फ़ाइल आगे निकल जाएगी... हमारे घर में बीमारी ना रहे...हमारे संतान नहीं तो बालक प्रकट हो जाए...ये सब काम्य कर्म है...
4. प्रायश्चित कर्म
जो कुछ हमसे भूल हो गई उसका तुरंत प्रायश्चित करो... हो गया...इंसान है हम लोग... देखने में भूल होगी... बोली में भूल हो जाएगी... कोई क्या अर्थ करेगा... आपका इरादा ना हो तो भी कौन क्या अर्थ करेंगे...उसी समय प्रायश्चित करना...
जैसे हम श्राद्ध करते हैं... तर्पण करते हैं....होम करते हैं... तीर्थों में जाकर अपने किए हुए कर्मों का प्रायश्चित कर देते हैं...
5...कर्तव्य कर्म देश...काल...परिस्थिति के अनुसार आया हुआ कर्तव्य निभाना...
(रामकथा - मानस विष्णुप्रयाग)



