@ पुष्पेन्द्रपुष्प
...सही कहा सुप्रीम कोर्ट ने आखिर क्यों किसी भी रिश्ते में विवाह से पहले शरीर सौंप देना कहां तक जायज है..?
भावनात्मक जुड़ाव, आर्थिक जुड़ाव वैचारिक जुड़ाव यह सब चलता है लेकिन शारीरिक जुड़ाव के बाद हारमोंस बदल जाते हैं भावनाएं और ज्यादा दृढ़ हो जाती है ऐसे में किसी भी प्रकार से यदि सामने वाला चाहे वह लड़का हो या लड़की आपके लिए उपयुक्त नहीं रहा तो निश्चय ही एक ऐसा खेल शुरू होता है जिसमें सिर्फ धंसना ही धंसना है बाहर आने की गुंजाइश बा मुश्किल हो पाती है।
सोसाइटी में "नो टच" का रूल फॉलो होना चाहिए जब तक की आपसी समझ पूरी तरह से डेवलप्ड न हो जाए।
कोर्ट की इस टिप्पणी को यदि समाज "नो टच पॉलिसी" के रूप में एक्सेप्ट कर ले तो महिला संबंधी अपराध, विवाह संबंधी अपराध या भावनात्मक संबंधी अपराध बहुत हद तक कंट्रोल किए जा सकते हैं ।
लेकिन यह कोर्ट ने कहा है मानना -समझना-क्रियान्वयन करना अपने अपने स्तर पर करना होगा । समाज का हर तबका, समाज का हर क्षेत्र "नो टच पॉलिसी" को गंभीरता पूर्वक विचार करते हुए प्रक्रिया प्रारंभ करना होगी।
हमारे परिवारों में हमारे बच्चों को यह सीखाना होगा कि जब तक पूरी तरह आप विकसित न हो जाए किसी भी रिश्ते में तब तक "नो टच पॉलिसी" कंपलसरी होना चाहिए।
इसीलिए भारतीय समाज में, सनातन धर्म में विवाह एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण पड़ाव माना गया जाता है हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों ने यही सोच करके विवाह को आश्रम की संज्ञा दी है कि जब तक विवाह न हो तब तक किसी से शारीरिक रूप से ना जुड़े ।
ब्रह्मचर्य को सामान्य अर्थों में कहा जाए तो "नो टच" होता है। ब्रह्मचर्य का सरलीकरण अर्थात "नो टच पॉलिसी" । किसी से भी मिलिए- बात करिए- सम्मान दीजिए- साथ दीजिए -व्यवहार कीजिए लेकिन एक प्रॉपर डिस्टेंस रखते हुए ...!
"नो टच नो टच विदाउट मैरिज नो टच"
यही अब आने वाले समय का प्रमुख सूत्र वाक्य बनना चाहिए ।
बात मुद्दे की
बात बेबाक...! "नो टच नो टच विदाउट मैरिज नो टच"
- 17 Feb 2026



