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सिनेमाँ - "DHRUNDHAR"

  • 21 Mar 2026

सिर्फ करोड़ों का या रिकार्ड बिजनेस किसी फिल्म की longevity तय नहीं कर सकती है। धुरंधर के बारे में मेरी कोई राय नहीं है। दुनिया की हर जासूसी फिल्म एक तरह का प्रोपेगेंडा ही है। ऐसी फिल्में लंबे समय में याद नहीं रखी जाती हैं।  
हिंसा, मारधाड़ को ग्लैमराइज़ किया जाना भी आम है।एनिमल के बाद हिंसा का ग्लैमराइजेशन हुआ ही है। अब अगले दो तीन वर्षों तक लंबे बाल, दाढ़ी और सिगरेट पीते नौजवान भारत में दिखें तो आश्चर्य नहीं। 
रणवीर सिंह अच्छे अभिनेता है सत्तर प्रतिशत जगहों पर वह या तो सिगरेट पी रहे हैं या गोली चला रहे हैं।
हर सीन में विलेन हो या हीरो सिगरेट पीता हुआ अच्छा नहीं लगता। सिगरेट एक बड़ा एलिमेंट है फिल्म में जहां हर आदमी को ( मेजर इकबाल से लेकर, हमजा अली और माधवन ) हर अच्छे डायलॉग से पहले सिगरेट पी रहे हैं, बुझा रहे हैं या धुआं छोड़ रहे हैं।
बाकी धुरंधर वर्तमान सरकार के सुकर्मों और कुकर्मों का गुणगान करते हुए एक तरह का नैरेटिव पेश करती है ।
आईएसआई के मेजर को दाउद की चमचागिरी करते दिखाना हास्यास्पद से अधिक कुछ नहीं है। यह दीगर है कि दाउद आईएसआई के रहमोकरम पर पाकिस्तान में रह रहा है। इन दोनों मामलों में चाहे अतीक अहमद हो या फिर दाउद, माफिया को इतना शक्तिशाली पेश किया गया जितना वह कभी नहीं रहा होगा। 
कैमरावर्क अच्छा है। स्टोरीटेलिंग भी ठीक है राकेश बेदी को जमाने बाद अच्छी भूमिका मिली है। 
युद्ध पर एक अच्छी फिल्म इक्कीस बनी है । अगर मारधाड़, पागलपन और राष्ट्रवाद का थोथापन देखने की इच्छा न हो तो इक्कीस देखनी चाहिए ।
आज से दस साल बाद जब कोई पुरानी फिल्म उठा कर देखना चाहेंगे तो उसमें न तो धुरंधर होगी न एनिमल बल्कि उसमें मैंने प्यार किया, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, अंदाज़ अपना अपना जैसी फिल्मों के नाम होंगे. दिल चाहता है जैसी फिल्में होंगी। लंचबॉक्स, शोले, दीवार जैसी फिल्में होंगी। सिनेमा का अपने समय से आगे तक दर्शकों के लिए सुंदर बने रहना ही उसकी असल सफलता है मसलन अमोल पालेकर और उत्पल दत्त की फिल्में हमेशा आनंद देती हैं ।
#पुष्प (FB से साभार)