बंगाल की राजनीति इन दिनों किसी सीरियल से कम नहीं लगती—बस फर्क इतना है कि यहाँ “कट” बोलने वाला डायरेक्टर नहीं है। हर पार्टी खुद को हीरो समझ रही है और सामने वाली को विलेन, लेकिन कहानी का असली किरदार—जनता—कहीं साइड रोल में धकेल दी गई है।
एक तरफ नेता जी मंच पर गरजते हैं—“हम आएंगे तो सब बदल देंगे!”
दूसरी तरफ विपक्षी नेता जवाब देते हैं—“ये लोग आए तो सब बिगाड़ देंगे!”
और जनता सोचती है—“भाई, पहले ये बता दो कि हमारा क्या सुधारोगे, बाकी लड़ाई बाद में कर लेना…”
राजनीतिक रैलियाँ अब मुद्दों से ज्यादा “माइक की ताकत” का मुकाबला बन गई हैं। जितनी जोर से भाषण, उतनी बड़ी हेडलाइन। पर अफसोस, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे असली मुद्दे बैकग्राउंड म्यूजिक की तरह धीरे-धीरे बजते रहते हैं—सुनाई कम देते हैं, लेकिन होते बहुत जरूरी हैं।
मजेदार बात ये है कि हर पार्टी खुद को जनता का सबसे बड़ा हितैषी बताती है।
लेकिन जब सवाल आता है—
युवाओं को नौकरी कब मिलेगी?
छोटे व्यापारियों को राहत कैसे मिलेगी?
किसानों की आय सच में कैसे बढ़ेगी?
तो जवाब थोड़ा “गोलमोल” हो जाता है—जैसे क्रिकेट में बॉलर नो-बॉल डालकर भी विकेट लेने की कोशिश कर रहा हो।
बंगाल की जनता भी अब समझदार हो चुकी है। वो सिर्फ नारे नहीं, नतीजे चाहती है। उन्हें ये फर्क नहीं पड़ता कि कौन सी पार्टी किससे ज्यादा लड़ रही है—उन्हें फर्क पड़ता है कि कौन उनकी जिंदगी बेहतर बना रहा है।
अंत में बात सीधी है—
राजनीति अगर सिर्फ “तू-तू, मैं-मैं” बनकर रह जाएगी, तो जीत चाहे किसी की भी हो… हार हमेशा जनता की ही होगी।
क्योंकि असली चुनाव नेता नहीं, जनता की उम्मीदें लड़ रही होती हैं।
खुली चिठ्ठी
“चुनाव का महासंग्राम: नेता बनाम नेता… और बीच में फंसी जनता”
- 18 Apr 2026



