नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए वोटिंग को अनिवार्य बनाने वाले तंत्र की आवश्यकता पर जोर दिया है। अदालत ने कहा कि ऐसा कोई गैर-दंडात्मक तंत्र बनाया जा सकता है, जिससे अधिक लोग वोट डालें, बेहतर उम्मीदवार सामने आएं और नोटा विकल्प धीरे-धीरे अप्रासंगिक हो जाए।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने मंगलवार को कहा कि नोटा (None of the Above) का ऑप्शन बेहतर कैंडिडेट को मैदान में खींचने और वोटर को अपनी वोटिंग का इस्तेमाल करने के लिए बढ़ावा देने के लिए बनाया गया था। कोर्ट ने कहा कि एक दशक के अनुभव से पता चलता है कि बहुत कम प्रतिशत में वोटर्स इस ऑप्शन का इस्तेमाल करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी की एक PIL पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उन इलाकों में नोटा को कैंडिडेट बनाने की बात कही गई थी, जहां सिर्फ एक कैंडिडेट मैदान में हो, ताकि यह पता चल सके कि अकेले कैंडिडेट पर वोटर का भरोसा है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि नोटा को कैंडिडेट बनाने के लिए, पार्लियामेंट को रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल एक्ट में बदलाव करना होगा।
सीनियर एडवोकेट अरविंद दातार ने कहा कि नोटा को कैंडिडेट के तौर पर बैलेट में रखने से पैसे और ताकत वाले कैंडिडेट अपने विरोधियों को मुकाबले से हटाने के लिए हिम्मत हारेंगे। अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने कहा कि जब वोटिंग फंडामेंटल राइट नहीं है, तो आर्टिकल 32 के तहत PIL कैसे मेंटेनेबल हो सकती है, जो फंडामेंटल राइट्स के उल्लंघन के मामले में सीधे SC जाने का रास्ता है।
साभार नवभारत टाइम्स
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लोकतंत्र की मजबूती के लिए 'अनिवार्य वोटिंग' पर जोर: सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी
- 25 Feb 2026



